भारत में मिट्टियाँ Types of Soil in India

भारत में मिट्टियाँ

Types of Soil in Indiain hindi.भारत एक soil विविधताओं वाला देश हैं। इसमें विभिन्न स्थानों पर भिन्न -भिन्न प्रकार की मिट्टियाँ पाई जाती हैं।जिनमें  मुख्य रूप से 8 प्रकार की मिट्टियाँ पाई जाती हैं-

(1)- जलोढ़ मृदा(Alluvial Soil):-

  • इस प्रकार की मिट्टी नदियों द्वारा बहाकर लाई गई होती हैं।
  • नदियों द्वारा बहाकर लाई गई यह मिट्टी उत्तर भारत के पश्चिम में पंजाब से लेकर सम्पूर्ण उत्तरी विशाल गंगा मैदानों में पाई जाती हैं। इसके साथ यह पूर्वी तट के नदियों के डेल्टाओं और कुछ नदियों की घाटियों में पाई जाती हैं।
  • इस मिट्टी में नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं ह्यूमस( पेड़-पौधों के सड़े गले अवशेष) की कमी होती हैं तथा पोटाश व चूना की मात्रा अधिक होती हैं।
  • इस मिट्टी को दो भागों में बांटा गया हैं।
  1. नई जलोढ़ मिट्टी- खादर
  2. पुरानी जलोढ़ मिटटी – बांगर
    • बांगर मृदा अपेक्षाकृत शुष्क होती हैं तथा इसकी सतह के नीचे चूने की गांठे पाई जाती हैं; जिसे कंकर के नाम से जानते हैं।
    • बांगर मृदा रबी की फसलों जैसे गेहूँ, कपास, तिलहन, दलहन, मक्का आदि फसलों के लिए उपयुक्त होती हैं।
    • पूर्वी तटीय मैदान के उपरी भाग में भी बांगर मृदा पाई जाती हैं जो की तम्बाकू तथा मक्का की कृषि के लिए उपयुक्त हैं।

(2)- काली मृदा (Black Soil or Regur Soil):-

  • यह मिट्टी दक्कन के पठार वाले लावा क्षेत्र में पाई जाती हैं।
  • इसका निर्माण बहुत ही महीन मृतिकार (चीका) पदार्थो से हुआ हैं,जो गीली होने पर काफी चिपचिपी हो जाती हैं और सूखने पर सिकुड़ने के कारण इसमें लंबी एवं गहरी दरारें पड़ जाती हैं।
  • यह मिट्टी स्वतः जुताई वाली मिट्टी भी कहलाती हैं।
  • इस प्रकार की मिटटी में लोहा, एल्युमीनियम, पोटाश और मैग्नीशियम की मात्रा अधिक होने के कारण इसका रंग काला होता हैं।
  • इस मिट्टी में फास्फोरिक तत्व एवं जैव पदार्थो की कमी होती हैं।
  • इस मिट्टी के कण घने होने के कारण इसमें नमी धारण करने की क्षमता अधिक होती हैं।
  • यह मिट्टी महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में पाई जाती हैं।
  • कपास की फसल के लिए यह मिट्टी बहुत उपयोगी हैं।

(3)- लाल मृदा(Red Soil ):-

  • इस मिट्टी का निर्माण प्राचीन रवेदार एवं कायांतरित चट्टानों जैसे ग्रेनाइट एवं नीस – शिष्ट पर अपक्षय की प्रक्रियाओं द्वारा होता हैं।
  • आयरन ऑक्साइड अधिक होने के कारण इसका रंग लाल होता हैं परन्तु जलयोजित क्षेत्र में ये पीले रंग में मिलती हैं।
  • लाल मिट्टी ने काली मिट्टी के क्षेत्र को लगभग चारों ओर से घेर रक्खा हैं। लाल मिट्टी प्राय: उच्च भूमियों पर जबकि काली मिट्टी निम्न भूमियों पर पाई जाती हैं।
  • यह मिट्टी इस प्रायद्वीप के पूर्वी भाग में पाई जाती हैं – जिसमें छोटा नागपुर का पठारउड़ीसा का अधिकांश क्षेत्र, छतीसगढ़पूर्वी मध्य प्रदेशतेलंगानानीलगिरी तथा तमिलनाडू का पठार सम्मिलित हैं।
  • इस मिट्टी में गेहूँ ,ज्वार, बाजरा, कपास, आलू तथा मुख्यतः मोटे अनाज की कृषि की जाती हैं। इसके अतिरिक्त तमिलनाडु एवं कर्नाटक में इस मिट्टी में रबड़ एवं कहवा के बागानों को भी विकसित किया गया हैं।

(4)-लेटराइट मृदा

  • उष्ण कटिबंधीय भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में तीव्र निक्षालन क्रिया के परिणामस्वरूप इस मिटटी का निर्माण होता हैं। निक्षालन की इस प्रक्रिया में लोहे के ऑक्साइड तथा एल्युमिनियम के यौगिग तत्व तो सतह पर बचे रहते है। पर चूना व सिलिका वर्षा के जल के साथ बह जाते हैं।
  • चूने के कमी के कारण यह मिटटी अम्लीय होती हैं।
  • गीली होने पर यह मिट्टी चिपचिपी तथा सूखकर ईट के तरह कठोर हो जाती हैं।
  • इस मिट्टी में नाइट्रोजन, फास्फेट और चूने की कमी होती हैं तथा लोहे के ऑक्साइड एवं पोटाश की अधिकता होती हैं।
  • उच्च तापमान में पनपने वाले जीवाणुओं द्वारा इसके ह्यूमस तत्व को नष्ट कर दिया जाता हैं।
  • यह मिट्टी इस प्रायद्वीपीय पठार के ऊँचे क्षेत्रों में पाई जाती हैं। यह सामान्यत: कर्नाटक, केरल, तमिलनाडू, मध्यप्रदेश, उड़ीसा और आसाम के पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती हैं। इस मिट्टी का सर्वाधिक विस्तार केरल में हैं।
  • अम्लीय होने के कारण इस मिट्टी में चाय की कृषि भी की जाती हैं।
  • इस मिटटी में फसल उगाने के लिए खाद और अन्य उर्वरकों का अधिक प्रयोग करना पड़ता हैं।
  • तमिलनाडू, आंध्र प्रदेश और केरल में काजू की खेती के लिए यह सबसे अधिक उपयुक्त मिट्टी हैं।

(5)-मरुस्थलीय मृदा

  • यह मिट्टी बलुई और क्षारीय होती हैं।
  • शुष्क जलवायु तथा उच्च तापमान और तीव्र वाष्पीकरण के कारण इसमें नमी और ह्यूमस के कमी होती हैं।
  • सिचाई किये जाने पर इसमें फसलें उगाई जा सकती हैं।
  • यह मृदा पश्चिमी राजस्थानदक्षिणी पंजाबदक्षिणी हरियाणा एवं उत्तरी गुजरात में पाई जाती हैं।

(6)-पर्वतीय एवं वनीय मृदा

  • यह मिट्टी पर्वतीय ढालों पर विकसित होती हैं।  इस मिट्टी की परत पतली होती हैं। इस मिट्टी में जैविक पदार्थो तथा नाइट्रोजन की अधिकता होती हैं।
  • पर्वतीय ढालों पर होने के कारण यह बागानी फसलों के लिए उपयुक्त होती हैं। भारत में चायकहवामसालें एवं फलों की कृषि इसी प्रकार की मृदा में की जाती हैं।
  • यह मृदा मुख्यतः हिमालय क्षेत्रउत्तर -पूर्वी भारत के पहाड़ी क्षेत्र, पश्चिमी एवं पूर्वी घाट तथा प्राय द्वीप के पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती हैं।

(7)-पीट एवं जैविक मृदा(Prary & Marshy Soil)

  • यह मिट्टी उच्च आद्रताभारी वर्षा तथा वनस्पति के अच्छी पैदावार वाले क्षेत्रों में इस प्रकार की मृदा पाई जाती हैं।
  • इस प्रकार की मिट्टी में जैव पदार्थ तथा ह्यूमस अधिक मात्रा में पाया जाता हैं।
  • इस प्रकार की मृदा काली, भारी एवं अम्लीय होती हैं। कुछ स्थानों पर यह क्षारीय भी पाई जाती हैं।
  • इस प्रकार की मिट्टी में पोटाश एवं फास्फोरस की कमी होती हैं।
  • इस प्रकार की मिट्टी बिहार के पूर्वोत्तर भागउत्तरांचल के दक्षिणी क्षेत्रोंबंगाल के तटीय क्षेत्रोंउड़ीसा और तमिलनाडु में मिलती हैं।

(8)-लवणीय एवं क्षारीय मृदा(Saline & Alkaline Soil)

  • इस प्रकार की मृदा का विकास मुख्य रूप से शुष्क जलवायु एवं समुचित अपवाह न होने वाले क्षेत्रों में हुआ हैं। ऐसी स्थिति में केशिका प्रभाव की क्रिया द्वारा सोडियम, केल्शियम, तथा मैग्नीशियम के लवण मृदा की ऊपरी सतह पर ही निक्षेपित हो जाते हैं।  जिसके कारण इसमें लवण की मात्रा बढ़ जाती हैं।
  • इस प्रकार की मिट्टी में नाइट्रोजन तथा चूने में कमी हो जाती हैं।
  • मृदा की क्षारीयता दूर करने के लिए हरी घास एवं जिप्सम डालने की सलाह दी जाती हैं।

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