मौलिक अधिकार

The fundamental rights in hindi

The fundamental rights in hindi.संविधान द्वारा प्रदत्त वे अधिकार जो किसी भी व्यक्ति के सर्वागीण विकास के लिए आवश्यक होते हैं। मौलिक अधिकार कहलाते हैं। इन अधिकारों में सामान्य विधि से न होकर संविधान में संशोधन द्वारा ही परिवर्तन किया जा सकता।

मौलिक अधिकार न्याय योग्य होते होते हैं अर्थात इन अधिकारों की रक्षा का उत्तरदायित्व न्यायपालिका पर होता है।

मौलिक अधिकारों का महत्व

  • किसी भी व्यक्ति के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक विकास के लिए मौलिक अधिकार बहुत आवश्यक हैं। इसके बिना सच्चे लोकतंत्र की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
  • किसी भी व्यक्ति या समुदाय विशेष को मौलिक अधिकार सुरक्षा चक्र प्रदान करते हैं, और उसमे राजनीतिक  चेतना को जाग्रत करने में सहायक होते हैं।

मौलिक अधिकार

भारतीय  संविधान के भाग -3 में मूल रूप में 7  मौलिक अधिकार प्रदान किये गए थे। लेकिन 74 वें संविधान संशोधन (1978 ) द्वारा सम्पत्ति  मौलिक अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची से निकालकर  क़ानूनी अधिकार बना दिया गया।

वर्तमान में 6 मौलिक अधिकार हैं –

  1. समानता का अधिकार
  2. स्वतंत्रता का अधिकार
  3. शोषण के विरुद्ध अधिकार
  4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
  5. संस्कृति तथा शिक्षा सम्बन्धी अधिकार
  6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार

1.समानता का अधिकार –

भारतीय संविधान में भारतीय नागरिकों के लिए निम्न समानताएं प्रदान की गई हैं।

  1. कानून के समक्ष समानता।
  2. धर्म, नस्ल, लिंग, जाति तथा जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव निषेध है।
  3. राज्य के अधीन नौकरियों का सभी को समान अवसर।
  4. अस्पृश्यता का निषेध।
  5. उपाधियों का निषेध।

2.स्वतंत्रता  का अधिकार –

भारतीय संविधान ने भारतीय नागरिकों को निम्न 6 स्वतंत्रताएं प्रदान की हैं –

  1. विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
  2. अस्त्र -शस्त्र  रहित शांतिपूर्ण सम्मेलन की स्वतंत्रता
  3. समुदाय या संघ या कोआपरेटिव सोसायटी निर्माण की स्वतंत्रता
  4. भारत के किसी भी राज्य क्षेत्र में निर्बाध भ्रमण की स्वतंत्रता
  5. भारत के किसी भी राज्य क्षेत्र में निवास की स्वतंत्रता
  6. भारत में किसी भी राज्य क्षेत्र में जीविकार्जन /व्यवसाय की स्वतंत्रता

याद रक्खे : ये स्वतंत्रताएं असीमित नहीं हैं। राज्य हित में किसी भी स्वतंत्रता पर राज्य सरकार प्रतिबंध लगा सकती हैं।


3 .शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनु0: 23 व 24) :

नागरिकों का शोषण रोकने के लिए शोषण के विरुद्ध अधिकारों को मौलिक अधिकारों में शामिल किया हैं।

अनु0 23  : मानव के दुव्यार्पार तथा बलात श्रम का प्रतिषेध : इस अनुच्छेद में तीन प्रकार के शोषण को प्रतिबंधित किया गया हैं –

  1. बलात श्रम – इच्छा के विरुद्ध कार्य करना
  2. बेगारी –काम के बदले पैसे न देना
  3. मानव व्यापार -मानव की खरीद -फरोख्त रोक

अनु0  24 : बाल श्रम का निषेध –  14  वर्ष से छोटे किसी भी बच्चे को किसी भी कारखाने, खान या जोखिम भरे काम में नियुक्त नहीं किया जा सकता हैं।

इसके अलावा भी 14 वर्ष से छोटे किसी बच्चे को किसी उद्योग में नहीं लगाया जा सकता हैं।


 4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनु0 : 25 से 28) –

1 . अनु0 25 :अन्त:करण की स्वतंत्रता :- सभी व्यक्तियों को अपने अन्त:करण के आधार पर किसी भी धर्म को मानने तथा उसके प्रचार-प्रसार की अनुमति होगी।

2. अनु0 26 : धार्मिक मामलों के प्रबंध की स्वतंत्रता :-  इस अनुच्छेद के अंतर्गत लोगों को अपने धार्मिक संस्थानों को स्थापित करने, संचालन करने तथा उनका पोषण करने का अधिकार होगा।

3.  अनु0 27 : धार्मिक अभिवृद्धि –  राज्य के द्वारा किसी धर्म विशेष के प्रोत्साहन के लिए कोई कर नहीं लगाया जायेगा। किन्तु किसी धर्म विशेष को सुविधा प्रदान करने हेतू उन्ही धर्म विशेष के लोगों से शुल्क वसूला जा सकता हैं जैसे – तीर्थ यात्रा या हज यात्रा को सुविधा देने के लिए शुल्क का वसूला जाना। 


5 .संस्कृति और शिक्षा-संबंधी अधिकार( अनु0 : 29 से 30)

1. अनु0 29 : अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण – अल्पसंख्यकों को अपनी भाषा, लिपि या संस्कृति को सुरक्षित रखने का पूर्ण अधिकार होगा अर्थात उन पर कोई अन्य संस्कृति थोपी नहीं जाएगी।

2. अनु 30 : शिक्षण संस्थाओं की स्थापना- भारत के सभी अल्पसंख्यक (भाषाई एवं धार्मिक) को अपनी रूचि की शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना एवं उनके प्रबंधन का पूर्ण अधिकार होगा। राज्य इन संस्थाओं को अनुदान देते समय किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं रखेगी।


6. संवैधानिक उपचारों  अधिकार (अनु0 32 )

भारतीय संविधान  मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन की शक्ति न्यायपालिका को दी हैं। नागरिकों के मौलिक अधिकारों के हनन की स्थिति में सर्वोच्च न्यायालय (अनु0 32) के तहत तथा उच्च न्यायालय (अनु0 226 )  तहत निम्न पांच प्रकार की रिट जारी कर सकता हैं।

1. बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus): इस रिट के द्वारा न्यायालय बंदी बनाये गए व्यक्ति को अपने सामने उपस्थित करने का आदेश देता हैं। ताकि यह सुनश्चित किया जा सके कि बंदी बनाये गए व्यक्ति को बंदी बनाने के समुचित कारण हैं भी या नहीं।

यदि बंदी बनाने के समुचित कारण नहीं मिलते तो न्यायालय व्यक्ति को रिहा करने का आदेश भी दे सकता हैं।

2. परमादेश (Mandamus) – इसका शाब्दिक अर्थ हैं कि “हम आदेश देते हैं ” . यह लेख तब जारी किया जाता है जब प्राधिकारी, अधिकारी, सरकार या अधीनस्थ न्यायालय अपने कर्तव्यों का सही ढंग से पालन नहीं करते हैं।

राष्ट्रपति एवं राज्यपाल के विरुद्ध ये लेख जारी नहीं किये जा सकते।

3 . प्रतिषेध(Prohibition)- इसका शाब्दिक अर्थ हैं  “मना कर देना ” . इस लेख /रिट अनुसार उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय अपने अधीनस्थ न्यायालय को उनके कार्य क्षेत्र से बाहर के कार्य को करने के लिए मना कर देता हैं।

4 . उत्प्रेषण (Certiorari)- इसका शाब्दिक अर्थ हैं “ मँगा लेना ”. इस लेख को उच्चतम या उच्च न्यायालय द्वारा न्यायिकर  अर्ध न्यायिक प्राधिकारी के विरुद्ध जारी किया जाता हैं। जो अपने अधिकार का उल्लंघन  हों।

प्रतिषेध और उत्प्रेषण में अंतर – प्रतिषेध लेख उस समय जारी किया जाता हैं जब न्यायिक प्रक्रिया चल रही हो, जबकि उत्प्रेषण का लेख उस समय जारी किया जाता हैं जब मामले पर निर्णय दिया जा चुका हो।

5 . अधिकार-पृच्छा (Quo -Warranto)– जब कोई प्राधिकारी किसी सार्वजनिक पद को अवैधानिक ढंग से ग्रहण कर लेता हैं तो प्राधिकारी को अपदस्थ करने के लिए न्यायालय जो लेख जारी करता उसे अधिकार -पृच्छा कहा जाता  हैं।

याद रखे – पद सार्वजानिक और संविधान या विधि द्वारा सृजित होना चाहिए।

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