राज्य के नीति निदेशक तत्व The directive principles of state policy India

The directive principles of state policy India hindi

The directive principles of state policy India hindi. संविधान की प्रस्तावना में जिन आदर्शो एवं उद्देश्यों की व्याख्या की गई हैं उन्हें मूर्त रूप प्रदान करने के लिए नीति निदेशक तत्वों को संविधान में शामिल किया गया हैं। ये वो सिद्धांत हैं जो कार्यपालिका और व्यवस्थापिका को उच्च आदर्श प्राप्त करने के लिए प्रेरित करते हैं।

राज्य के नीति निदेशक तत्व

  • संविधान निर्माताओं ने भारत को एक लोक कल्याणकारी राज्य बनाने के लिए नीति निदेशक तत्वों को संविधान में शामिल किया।
  • भारत शासन अधिनियम -1935 में शामिल अनुदेशों को भारतीय संविधान में नीति निदेशक तत्वों के रूप में स्थान  दिया गया।
  • राज्य के नीति निदेशक तत्वों का मूल उद्देश्य राज्य तथा कार्यपालिका को स्वैच्छिक रूप से कल्याणकारी कार्यो की और प्रेरित करना है न कि इसके उपबंधों को न्यायालय द्वारा लागू कराना।
  • राज्य के नीति निदेशक तत्व संविधान में चौथे भाग में अनुच्छेद 36 – 51 तक शामिल हैं।

अनुच्छेद :38  राज्य लोक कल्याण की अभिवृद्धि के लिए सामाजिक व्यवस्था बनाएगा।  

  • अर्थात राज्य ऐसी सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करेगा जिससे उसके सभी नागरिकों को समान सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय के अवसर उपलब्ध हो सके।
  • राज्य किसी क्षेत्र विशेष, समुदाय विशेष या व्यवसाय विशेष में सम्मिलित लोगों की बीच आय की असामनता को दूर करने का प्रयास करेगा।
  • राज्य ऐसी व्यवस्था करेगा जिससे स्त्री और पुरुषों को समान कार्य समान वेतन मिले।

अनुच्छेद : 39 सभी के लिए समान न्याय निःशुल्क विधिक सहायता की व्यवस्था करना।

  • राज्य इस प्रकार कार्य करेगा कि धन के अभाव में कोई भी व्यक्ति  न्याय पाने से वंचित न रह जाये।

(अनुच्छेद : 40) – स्वायत्त शासन की मजबूती के लिए ग्राम पंचायतों का गठन

अनुच्छेद :41 राज्य काम, शिक्षा तथा बेरोजगारी, बुढ़ापा, बीमारी  अन्य शारीरिक विकलांगता होने पर लोक सहायता का प्रबंध करेगा।

  • महात्मा गाँधी रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) योजना तथा वृद्धावस्था पेंशन योजना, दिव्यांग पैंशन योजना (विकलांग पैंशन ), निराश्रित महिला पैंशन योजना (विधवा पैंशन) और राष्ट्रीय पारिवारिक लाभ आदि विभिन्न योजनाएं संविधान के इसी अनुच्छेद के माध्य्म से लागू हुई हैं।

अनुच्छेद:42  राज्य काम की न्यायसंगत और मानवीय दशाओं को सुनिश्चित करेगा तथा प्रसूति (Maternity) सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था करेगा। 

अनुच्छेद : 43 राज्य, कर्मकारों के लिए कार्य, उनके निर्वाह हेतु मजदूरी व एक अच्छा जीवन स्तर उपलब्ध कराने के साथ – साथ उसे सामाजिक तथा सांस्कृतिक अवसर उपलब्ध करएगा।

इसी के साथ राज्य, ग्रामों में कुटीर उद्योगों को बढ़ाने का प्रयास करेगा।

अनुच्छेद 43 क :  राज्य  उद्योग या किसी संगठन में लगे कर्मकारों को उद्योग या संगठन के प्रबंधन में उनकी भागीदारी को सुनिश्चित कराने  का प्रयास करेगा।

अनुच्छेद 44 ; राज्य, भारत के समस्त राज्य क्षेत्र में एक समान नागरिक संहिता (Uniform  Civil Code) लागू कराने का प्रयास करेगा।

अनुच्छेद 45 : राज्य, बच्चों के लिए निःशुल्क  और अनिवार्य शिक्षा का प्रबंध करेगा।

  • राज्य को सभी बच्चों की  तब तक देखभाल व  शिक्षा की व्यवस्था करेगा जब तक कि वह बच्चा 6 वर्ष की आयु प्राप्त नहीं कर लेता। (86 वा संविधान संशोधन 2002 )

अनुच्छेद 46 : राज्य, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य दुर्बल वर्गों की शिक्षा और अर्थ सम्बन्धी हितों की वृद्धि के लिए प्रयास करेगा।

अनुच्छेद 47 : राज्य अपने नागरिकों के पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊँचा करने तथा उनके स्वास्थ्य को सुधारने के लिए प्रयास करेगा।

अनुच्छेद 48 : राज्य, कृषि और पशुपालन को आधुनिक तथा वैज्ञानिक ढंग से संगठित करने तथा दुधारू पशु (खासकर गोवंश) के मारने पर रोक लगाएगा।

अनुच्छेद 48 क : राज्य, देश के पर्यावरण सरंक्षण व  संवर्धन तथा वन्य व वन्य जीवन की रक्षा का प्रयास करेगा।(42  वा संविधान संशोधन 1976 )

अनुच्छेद 49  : राज्य, राष्ट्रीय महत्व घोषित संस्मारकों, स्थानों एवं वस्तुओं  संरक्षण के लिए अनिवार्य रूप से कार्य करेगा।

अनुच्छेद 50  : राज्य, लोकसेवाओं में कार्यपालिका को न्यायपालिका से पृथक करने प्रयास करेगा।

अनुच्छेद 51 : अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा की अभिवृद्धि 

  • राज्य, राष्ट्रों के मध्य अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा में अभिवृद्धि  लिए प्रयास करेगा।
  • राज्य , राष्ट्रों के मध्य न्यायसंगत और सम्मानपूर्ण संबंधों की अभिवृद्धि के लिए प्रयासरत रहेगा।
  • अंतर्राष्ट्रीय विधि और संधि की बाध्यताओं के प्रति आदर बढ़ाने का प्रयास करेगा।
  • अंतर्राष्ट्रीय विवादों का निपटारा मध्यथता द्वारा करने  करेगा।


नीति निदेशक तत्वों के बारे में विचार

  • राज्य के नीति निदेशक तत्वों  उद्देश्य जनता के कल्याण  प्रोत्साहित करने वाली सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करना हैं। – डॉ. राजेंद्र प्रसाद 
  • ये सिद्धांत प्रजतंत्रात्मक भारत का शिलान्यास करते है जब भारत सरकार इन्हें कार्यरूप में परिणत कर सकेगी तो भारत एक सच्चा लोककल्याणकारी राज्य कहला सकेगा।– डॉ. एम.बी पायली (इंडियन कॉन्स्टिटूशन)
  •  अधिकांश निर्देशों का ध्येय आर्थिक और सामाजिक लोकतंत्र स्थापित करना हैं, जिसका संकल्प उद्देशिका से लिया गया हैं। -दुर्गादास बसु 
  • अधिकांश सिंद्धान्तों के पीछे फेबियन समाजवाद का दर्शन हैं जिसमें से समाजवाद निकाल दिया गया हैं, क्योकि इसमें उत्पादन वितरण एवं विनिमय के साधनों के राष्ट्रीयकरण का अभाव हैं। -सर आइवर जेनिंग्स

    Difference between fundamental rights and Directive principles of state policy in hindi

    मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्वों में अंतर

    मौलिक अधिकार  नीति निर्देशक तत्व 
    इन्हें संविधान के भाग 3 में रखा गया हैं। इन्हें संविधान के भाग 4 में रखा गया हैं।
    इन्हें अमेरिका के संविधान से लिया गया हैं। इन्हें आयरलैंड के संविधान से लिया गया हैं।
    इनका विषय व्यक्ति हैं। इनका विषय राज्य हैं।
    ये नकारात्मक हैं। ये सकारात्मक  हैं।
    इनमें न्यायालय द्वारा परिवर्तन किया जा सकता हैं। ये न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं।
    ये अधिकार नागरिकों को स्वत : प्राप्त होते हैं। ये साधन मात्र हैं।
    इन्हें आपात काल में रद्द किया जा सकता हैं। इन्हें आपात काल में रद्द नहीं किया जा सकता।
    इनका उद्देश्य राजनीतिक प्रजातंत्र की स्थापना करना हैं। इनका उद्देश्य सामाजिक और आर्थिक प्रजातंत्र की स्थापना करना हैं।

——————————————————————————————————————

नीति निदेशक तत्वों की आलोचना

  • नीति निदेशक तत्वों ने न्यायपालिका, विधायिका तथा कार्यपालिका के बीच संघर्ष को जन्म दिया हैं। – के. संथानम 
  • नीति निदेशक तत्व तर्कहीन एवं अनुचित तरीके से वर्गीकृत किये गए हैं। – एन. श्रीनिवासन 
  • नीति निदेशक तत्व धर्मिक उपदेश की तरह हैं। – के. सी. व्हेयर 
  • नीति निदेशक तत्व भावनाओं का स्थाई कूड़ाघर हैं। – टी. टी. कृष्णामचारी 
  • नीति निदेशक तत्व एक ऐसा चेक हैं जिसे बैंक की सुविधानुसार अदा किया जायेगा। – के.टी शाह 
error: Content is protected !!